असहिष्णुता की आड़ में सेकीं जा रही राजनीतिक रोटियां 

P-7-(23-11-15) MON.p65कोलकाता, 22 नवंबर ( नि. प्र)। भारतीय विज्ञान व युक्तिवादी समिति ने देश में धार्मिक असहिष्णुता की बढ़ती घटनाओं को चिंताजनक करार दिया है। समिति के अध्यक्ष प्रवीर घोष ने कहा कि देश में बढ़ती असहिष्णुता,  दादरी और केरल भवन काण्ड के विरोध में वामपंथी बुद्धिजीवियों के संगठन भाषा व चेतना समिति की ओर से कोलकाता के धर्मतल्ला में बीफ पार्टी आयोजित की गई। इस बीफ  पार्टी के आयोजक इमानुल हक, माकपा नेता तथा कोलकाता के पूर्व मेयर विकास रंजन भट्टाचार्य, तृणमूल कांग्रेस समर्थित कवि  सुबोध सरकार सहित कई लोगों ने बीफ खाया। किन्तु इस बीफ पार्टी को लेकर पार्टी के आयोजक तथा समिति के सचिव इमानुल भाई  से एक प्रश्न है, क्या वे कोलकाता में खुलेआम इसी तरह से पोर्क पार्टी का आयोजन कर दिखा सकते हैं? ऐसा करके दिखाएं कि उस पोर्क पार्टी में अल्पसं”यक समुदाय के कितने लोग शामिल होकर भाईचारा बढ़ाने का संदेश देने के लिए आते हैं। बीफ पार्टी या पोर्क पार्टी को इस तरह खुलेआम आयोजित करने से हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के लोगों के बीच भाईचारा बढ़ने के बजाय सांप्रदायिक भेदभाव और बढ़ेगा।  देश में बीफ खाना कोई नई बात नहीं है। इसका धर्म से कोई संबंध नहीं है।  मैं बीफ (गो मांस) खाऊं या पोर्क (सुअर मांस) यह मेरी मर्जी है। एक समय ऐसा था जब मैं भी बीफ और पोर्क खाया करता था, लेकिन वृद्धावस्था में शारीरिक कारणों से मांस खाना छोड़ दिया।

         इधर कुछ दिनों से देखा जा रहा है कि गोमांस की अफवाह में किसी बेगुनाह को मौत के घाट उतार दिया गया अथवा गोमांस नहीं खाने के लिए फतवा जारी कर बयानबाजी की जा रही है। ऐसे में, सरकार को इस तरह के फतवे जारी या बयान देने वालों के खिलाफ कदम उठाना चाहिए। लेकिन देखा जा रहा है कि देश के विभिन्न प्रदेशों में गोमांस को लेकर एक अजीब सा हंगामा मचा हुआ है।

           इस तरह की बयानबाजी से दुनियाभर में देश की अत्यंत निराशपूर्ण छवि आ रही है। हम क्यों इतने असहिष्णु होंगे? यदि वक्त रहने इस तरह की भड़काऊ बजनबाजी पर लगाम नहीं लगाया गया तो देश में असहिष्णुता और भी बढ़ेगी। सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि हमारे पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में भी असहिष्णुता बढ़ रही है। भारत और बांग्लादेश में बुद्धिजीवियों, लेखकों और तर्कवादियों पर हमले हो रहे हैं।

     प्रश्न है, आखिर देश में यह असहिष्णुता क्यों पैदा हुई है? क्या देश की आम जनता इस असहिष्णुता को लेकर  माथापच्ची करना चाहती है? शायद नहीं, आम लोग दो वक्त की रोटी, सिर छिपाने के लिए घर और तन ढकने के लिए कपड़े मांगते हैं। जब कोई सरकार देश की आम जनता की इन मांगों पूरा करने में नाकाम होती है, तो गोमांस जैसे मुद्दों उठाकर लोगों को गुमराह किया जाता है। इसे रूप में भी देखा जा सकता है कि देश में महंगाई जब चरम पर है, तो लोगों में सत्ता के खिलाफ आक्रोश होना लाजिमी है। कहीं ऐसा तो नहीं है कि महंगाई या आम जनता के हित से जुड़े मुद्दों की ओर से ध्यान हटाने के लिए असहिष्णुता जैसे मुद्दों को हवा दी जा रही है। पर, आम जनता तो देश में असहिष्णुता नहीं, सिर्फ और सिर्फ सहिष्णुता चाहती है।

    इधर, हाल ही में संपन्न हुए बिहार के विधानसभ चुनाव में कांग्रेस, राजद और जदयू के महागठबंधन ने नरेंद्र मोदी की पार्टी भाजपा को शर्मनाक हार का मुंह दिखा दिया। अब अगले वर्ष 2016 में पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने वाला है। उस चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस को राज्य की सत्ता से उखाड़ फेंकने के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष  चुनाव केंद्रीय बल के नैताती में होना जरूरी है। किन्तु उससे पहले राज्य के विरोधी दल वाममोर्चा तथा माकपा और कांग्रेस के बीच चुनावी गठबंधन की संभावना है। इसके अलावा, केंद्र की सत्तारूढ़ भाजपा भी बंगाल की सत्ता पर काबिज होने के लिए हर संभव प्रसाय करेगी।

(प्रकाशितः दैनिक विश्वमित्रः सोमवार 23 नवंबर 2015)

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One Response to “असहिष्णुता की आड़ में सेकीं जा रही राजनीतिक रोटियां ”

  1. Sudipto Kumar Biswas 8 December 2015 at 11:33 PM #

    লেখাটির বাংলা অনুবাদ পড়তে চাই।


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